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" सिर्फ़ हीरा नहीं कोहिनूर वतन है मेरा " / dainikmail24.com

अमित कुमार तिवारी प्रयागराज से


      स्वतंत्रता दिवस की 74वीं वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर साहित्यकार प्रमोद कुमार द्विवेदी "लन्ठ" प्रतापगढ़ी जी की अध्यक्षता में नवसृजित फेसबुक पेज " अभिव्यक्ति संगम " पर संपन्न हुआ ऑनलाइन कवि सम्मेलन एवं मुशायरा ।

      कार्यक्रम की शुरुआत श्री "लन्ठ" प्रतापगढ़ी जी के अध्यक्षीय उद्बोधन एवं माँ भारती की आराधना के साथ हुई ।

     तत्पश्चात मध्यप्रदेश के छिन्दवाडा जिले से लाइव हिन्दुस्तान की मशहूर शायरा सुश्री अंजुमन मंशूरी जी ने अपना कलाम कुछ यूँ पेश किया --


सिर्फ हीरा नहीं कोहिनूर वतन है मेरा ।

सारी दुनिया में ये मशहूर वतन है मेरा ।।


सब जुबानों में पुरानी जुबां हमारी है ।

वेद संस्कृत के निशानी रवां हमारी है ।।

गिनना आसान किया हमने दशमलव देकर,

शून्य से नौ तलक ये हिन्दसां हमारी है ।। सिर्फ़ हीरा नहीं ।।

       इसके बाद प्रख्यात व्यंग्यकार आदरणीय श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय "भावुक" जी ने अपनी रचना के माध्यम से वर्तमान व्यवस्था पर चोट करते हुये पढा--

उन्हें क्या देगा पंद्रह अगस्त ।

जो लुटे पिटे हैं अस्त व्यस्त ।।


      जनपद प्रतापगढ़ के शीर्षस्थ कलमकार और अपने छंद वा गीतों के माध्यम से सम्पूर्ण भारतवर्ष में तहलका मचाने वाले स्व पंडित आद्या प्रसाद "उन्मत्त" जी के प्रिय शिष्यों में से एक आदरणीय श्री सुनील कुमार पाण्डेय "प्रभाकर" जी ने अपने राष्ट्रीय छंद वा गीतों के माध्यम से स्वतंत्रता आन्दोलन का दृश्य उपस्थित कर पेज पर शमां गुलज़ार कर दिया  --

देश के चरण में चढाने चले सीस उन,

देशभक्त योद्धाओं के हाथ में तिरंगा था ।

चंद्रशेखर के कनपटी से चली लकीर,

घास पे गिरे तो बना माथ पे तिरंगा था ।।

*****

मेरी इस अनुपम माटी में गीता के गुन्जित स्वर बिखरे ।

जग को मानस देने वाला वह रामचरित इसपर निखरे ।।

इसमें कान्हा की वंशी है इसमें नारद की वीणा है ।

इसके कण-कण में अभिरंजित मीरा की अविरल पीडा है ।।

          अंत में मुख्य अतिथि आदरणीय श्री संजय शुक्ला जी (समाज सेवी) ने स्वतंत्रता आन्दोलन पर दृष्टि डाल साहित्य को समाज का आइना बताते हुए कहा  --

    लाल किले की प्राचीर पर आयोजित कवि सम्मेलन के समापनोपरान्त सीढियां उतरते समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी लडखडा गए किन्तु गिरने से पहले ही राष्ट्र कवि रामधारीसिंह "दिनकर" जी ने उन्हें अपनी बांहों में सँभाल लिया , नेहरू जी ने धन्यवाद कहा तो दिनकर जी मुस्कुराये और बोले धन्यवाद की कोई बात नहीं क्योंकि जब राजनीति गिरती है तो साहित्य ही उसे संभालता है किन्तु आज हमारे सम्मुख ऐसा अंतराल है कि हमारा साहित्य पतन की ओर जाती हुई राजनीति को सँभालने में असमर्थ प्रतीत हो रहा है ।

    प्रश्न यह उठता है कि यह स्थिति आई क्यों  ?

      या तो राजनीति इस सीमा तक गिर चुकी है कि अब उसमें सॅभलने की भी सामर्थ्य नहीं बची या हमारा साहित्य स्वयं अपंग हो गया है कि अब उसमें गिरती हुई राजनीति को सँभालने की शक्ति नहीं बची ।

    जिस दिन हमने इस प्रश्न के उत्तर को खोजकर अपने दायित्व को समझ लिया तो यह भारतवर्ष पुनः सोने की चिडिया होगा ।

      कार्यक्रम का कुशल संचालन किया युवा कलमकार उमेश मिश्र "भारतीय" ने और आमंत्रित कवियों/शायरा पेज से जुड़े समस्त सम्मानित जनों के प्रति आभार संयोजक सुश्री चाँदनी दुबे जी ने व्यक्त किया ।।


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर कार्यक्रम था कल का

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  2. इस तरह के कार्यक्रम समाज को एक नई दिशा दे सकते है ।

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  3. बहुत सुन्दर कार्यक्रम था कल का

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  4. जी बहुत अच्छा कार्यक्रम था

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