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*आप युद्ध भूमि में , मिशाल बन जाइए: अंजनी अमोघ* Daink Mail 24

 *आप युद्ध भूमि में , मिशाल बन जाइए: अंजनी अमोघ* Daink Mail 24

टीम दैनिक मेल 24 (लखनऊ)



साहित्यकार समाज का दर्पण होता हैं यह तो सभी जानते हैं और ऐसा सभी कहते हैं, पर एक सच्चा साहित्यकार होता कैसे है ? शायद कुछ लोग ही जानते हैं। जनपद प्रतापगढ़ ही नहीं अपितु सम्पूर्ण देश के सम्मानित ओज कवि, साहित्य की सबसे बड़ी संस्था राष्ट्रीय कवि संगम के काशी प्रांत के अध्यक्ष, 150 से अधिक संस्थाओं से विभिन्नता  सम्मानों से सम्मानित, 10 से अधिक टीवी  चैनलों पर काव्य पाठ के साथ दूरदर्शन एवम आकाशवाणी पर भी आपनी ओज पूर्ण कविताओं का  प्रसारण देने वाले सम्मानित साहित्यकार अंजनी अमोघ की कविताओं में वह दम हैं जो युवाओं में मातृभूमि के प्रति जोश को उपजा देती हैं। तो आईए हम आप भी पढते है साहित्य रत्न ओज कवि अंजनी अमोघ जी का यह छंद----

ओज तेज शौर्य वीर ,लालिमा ललाट पर 
आप युद्ध भूमि में , मिशाल बन जाइए।
धरे भीमकाय रूप, तन बने  विकरुप
ब्याल सम महा विकराल बन जाइए।।
खण्ड -खण्ड  किजिए, विरोधियों के नर मुंड
 आप रण मध्य लाल लाल बन जाइए।
एक एक महावीर, धर के  प्रचण्ड रूप
आप दुष्ट चीनियों के काल  बन जाइए।।(1)

दुश्मनों के अंग -अंग  विष भरें रंग -रंग,
आप राष्ट्र रक्षा में मार्तण्ड बन जाइए ।
चढ़े  ज्वार अंड -बंड, करो उन्हें खण्ड- खण्ड
कुछ दिन आप भी उद्दण्ड बन जाइए।।
झूठ और पाखंड के, तोड़ दे घमंड अब
मातृभूमि हेतु मेरुदण्ड बन जाइए।
अखण्ड महाखण्ड, शिलाखण्ड हिन्द की  धरा
इसकी सुरक्षा में प्रचण्ड बन जाइए।।(2)

आप सब मिलकर बैरियों की भूमि पर,
कैप्टन मनोज की कहानी बन जाइए।
थर थर कांप जाय सारे टैंक दुश्मनों के,
अब्दुल हमीद की जवानी बन जाइए।।
अंग -अंग जोश हो भरा जोरदार रोष हो,
युद्ध पदचाप की निशानी बन जाइए।
रिपु के लहू से ,तिलक लगे ललाट पर 
महान शूरवीर सेनानी बन जाइए।।(3)

जब शत्रु करे आप से बार बार शत्रुता,
उसे जोरदार ढंग से डांटना चाहिए।
यदि कई रिपु एक साथ मिल जाय तब,
उन्हें कूटनीति चाल से बांटना चाहिए।।
प्रतिपक्ष के सुपक्ष में खड़ा मिले रक्ष में,
दुश्मनों को हरहाल में छांटना चाहिए।
एक - एक तोड़-तोड़ नस कमजोर कर
फिर इनके अंग - अंग काटना चाहिए।।(4)

बनें हुए देवदूत, चढ़े हुए खूब भूत,
सारे भूत यमदूत , बन झाड़ दीजिए।
अर्थतंत्र यंत्र मंत्र, के बने षडयंत्र है
हिंदुस्तान भूमि से ,इन्हें उखाड़ दीजिए।।
अब   शौर्यता वीरता,का हो युद्ध  शंखनाद
वक्ष पर चढ़ कर वक्ष फाड़ दीजिए।।
सिर चढ़े घमंड है फुलाएं भुजदण्ड है
इष्ट मित्र भाई बन्धु संग गाड़ दीजिए।।(5)

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