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अच्छाई के जवाब से बुराई परेशान- डा.अरुण रत्नाकर Dainik Mail 24

 


प्रतापगढ़। कहते हैं कि बुराई कितनी भी ताकतवर हो आखिर में अच्छाई के सामने घुटने टेक ही देती है।एक बार की बात है।अच्छाई और बुराई दोनों बहनों में आपस में जोरदार बहस हुई।बुराई बहन अच्छाई से बोली कि तुम मेरी बहन हो।मैं तुम्हारा हित चाहती हूँ।तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम मेरे सम्मुख आत्मसमर्पण कर दो,क्योंकि दूरदूर तक तुम्हारा नाम लेने वाला कोई नहीं है।मेरा भाई झूठ मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चलता है।जहाँ देखो वहाँ मेरा ही जलवा है।चारों तरफ मेरी ही जय जयकार है।मैं पल भर में लोगों को मालामाल कर देती हूँ।मेरे अनुयायी ढेरसारे हैं और तुम्हारे तो बहुत कम हैं।मेरे आगे तुम्हारा अस्तित्व कुछ भी नहीं है।मेरे अनुयायी दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहे हैं और एक समय आएगा कि तुम कहीं की नहीं रहोगी।

अच्छाई अपनी बुराई बहन की बात बहुत ध्यान से सुन रही थी।अन्त में अच्छाई से रहा नहीं गया और बुराई को जवाब देते हुए कहती है कि हे बहन!मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ।मैं मानती हूँ कि चारों ओर तुम्हारा रुतबा कायम है।मेरा नाम दूर दूर तक लेने वाला कोई नहीं है।मेरे अनुयायी भी कम संख्या में हैं।अगर मैं आपके सम्मुख आत्मसमर्पण करती हूँ तो मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।फिर तो हर जगह आप ही आप रहेंगी।लेकिन हे बहन सुनो।मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूँगी।मैं जहाँ भी रहूँगी आत्म सम्मान से रहूँगी।मेरा भाई तो सत्य है जिसे ईश्वर का भी वरदान प्राप्त है।मैं जहाँ भी रहूँगी गुलाब की भाँति महकूँगी।अच्छाई की बात सुनकर बुराई परेशान हो गई और अच्छाई के सम्मुख बुराई नतमस्तक हो गई।








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