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गोरखपुर(उ०प्र०)लखनौरा में नहीं पहुंची विकास की किरण Dainik Mail 24

 

रिपोर्ट-स्वरूप श्रीवास्तव गोरखपुर 16-11-2020


गोरखपुर जनपद के क्षेत्र  बड़हलगंज विकास खण्ड का एक ऐसा गांव जहां आजादी के बाद आज भी विकास की कोई किरण नहीं पहुंची।गांव के भीतर गलियों में एक भी सरकारी ईंट नहीं लगी है।घरों से निकलने वाले गन्दे जल के निकासी हेतु एक भी नाली निर्मित नहीं है।यहां के लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। आजादी के बाद देश में विकास की बात की जाती है लेकिन यहां मूलभूत सुविधाएं लोगों को नहीं मिल रही है।हम बात कर रहे हैं बडहलगंज विकास खण्ड के ग्राम पंचायत लखनौरी के टोला लखनौरा की।

   बडहलगंज विकास खण्ड के कछार क्षेत्र में करीब 800 की आबादी वाला लखनौरा गांव विकास के मामले में फिसड्डी है।आश्चर्य होता है कि आजादी के 70 सालों बाद भी अभी हमारे यहां ऐसे पिछड़े गांव भी हैं जो मूल-भूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं।इस गांव के उत्तर तरफ दशकों पूर्व बना एक खड़ंजा जो प्राथमिक विद्यालय तक जाता है।पिछले साल गांव के दक्षिण से लगभग 150 मीटर सांसद निधि से बना सीसी रोड है।दोनों ही सड़कों की स्थिति दयनीय है।बस यही विकास है इस गांव का।इसके अतिरिक्त इस गांव में न कोई अन्य खड़ंजा है,न नाली।घरों से निकले गन्दे पानी को ग्रामीण अपने दरवाजे पर गढ्ढा खोद जमा करते हैं।सारी गलियां धूल फांक रही हैं।सबसे बुरा हाल स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण का है।दो-चार को छोड़ दिया जाय तो इस योजना में बने  लगभग सारे शौचालय ध्वस्त हो चुके हैं।लाखों रुपये का सरकारी अनुदान राप्ती नदी के पानी में बह चुका है।जिम्मेदार आंखें बंद किये मौन साधे पड़े हैं।प्राथमिक विद्यालय के दक्षिण एक ही स्थान पर राजा,अंबिका,हरिपाल,कृपाल,बाबूराम,राजकुमार, जयश्री, रामाश्रय,मुन्नीलाल, प्रदीप आदि का शौचालय पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।ये लोग खेतों व रास्तों के किनारे जाने को मजबूर हैं।लखनौरा गांव के लोगों का कहना है कि उनके गांव में आजादी के बाद से अब तक गांव के भीतर रास्तों का निर्माण नहीं कराया गया है।जिससे हम लोगों को काफी असुविधाएं होती है।गांव के अंदर एक भी नाली का निर्माण नहीं हुआ है।दरवाजे पर खुले गड्ढे में घरों से निकला गंदा पानी एकत्र होता है। बारिश के समय घर से निकलना मुश्किल हो जाता है।कई लोग सुविधाओं के अभाव में पलायन करने को भी मजबूर हैं।चुनाव के समय की बात को छोड़ दी जाए तो लखनौरा गांव में कभी भी अधिकारी और जनप्रतिनिधि नहीं पहुंचते। आजादी के 70 साल बाद भी गांव में विकास की किरण नहीं पहुंची है।हर साल प्रकृति की मार झेल रहे ग्रामीणों की व्यथा को दूर करने को कोई योजना यहां नहीं पहुंची है। लोग परेशानी में जी रहे हैं। पगडंडी वाले रास्ते, टूटे पुल-पुलिया और धूल फांकती गांव की गलियां विकास की निशानी है। हर साल बाढ़ का कहर अलग से परेशानियों को कई गुना बढ़ा देता है।गांव में चलने के लिए सड़क नहीं है।प्रकाश के लिए बिजली के खंभों पर बल्ब भी नहीं है।ग्रामीण सुखमन साहनी,पूनम,मैनेजर जंगबहादुर,वकील,वेदप्रकाश, कलावती,ज्ञानती, सुनीता,यशोदा,रेशमा,संगीता आदि एक स्वर से कहते हैं कि आजादी के बाद भी उनका गांव उपेक्षित है।कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।प्रधानऔर और सचिव गांव के विकास पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। हर साल पंचायत के विकास की राशि राप्ती की बाढ़ में बह जाती है। विकास जमीनी हकीकत से दूर है। चुनाव के समय तो सपने दिखाते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद वे भूल जाते हैं।बुजुर्ग मैनेजर साहनी की मानें तो लखनौरा के दुर्दशा का मूल कारण चुनावों के समय मीट,दारू और धन पर मतदान है।निषाद बाहुल्य इस गांव में शिक्षा का पूरी तरह अभाव है जिससे लोग जनप्रतिनिधियों का चुनाव प्रभाव और उत्कोच पर करते हैं।इसीलिए यहां विकास दम तोड़ रहा है!








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