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विश्व हिंदी दिवस पर स्वतंत्र कवि मंडल की आयोजित हुई काव्य गोष्ठी


साहित्यकार अनूप त्रिपाठी एवं संजय शुक्ला को जगत सत्यम एवं स्वतंत्र सौरभ भेंट कर किया गया सम्मानित



सांगीपुर, प्रतापगढ़। विश्व हिंदी दिवस पर महाकवि छविश्याम द्वारा स्थापित सामाजिक एवं साहित्यिक संस्था स्वतंत्र कवि मंडल सांगीपुर की मासिक काव्य गोष्ठी , ब्लॉक सांगीपुर के ग्राम खानीपुर के मजरे सूरजपुर (कुसही) में रचनाकार धर्मराज सिंह बाबा राज प्रतापगढ़ी के निवास पर हर्षोल्लासपूर्वक संपन्न हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता मंडल के अध्यक्ष अर्जुन सिंह ने तथा संचालन युवा रचनाकार अशोक विमल ने किया।

इस अवसर पर साहित्यकार पत्रकार अनूप त्रिपाठी एवं समाजसेवी संजय शुक्ला को मंडल के संरक्षक यज्ञ नारायण सिंह अज्ञेय की कृति जगत सत्यम एवं मंडल के वार्षिकांक 2020 स्वतंत्र सौरभ की प्रति भेंट कर सम्मानित किया गया।

मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, पूजन एवं दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुई गोष्ठी में दो बच्चियों द्वारा प्रस्तुत की गई मां की वंदना के बाद आयोजक बाबा राज प्रतापगढ़ी ने सभी का स्वागत किया।

अध्यक्षता करते हुए अर्जुन सिंह ने कहा कि विश्व हिंदी दिवस, साहित्यकारों के लिए गौरव का दिवस है। टेढ़े मेढ़े रास्ते से होकर जिस तरह से ग्रामीण अंचल में साहित्यकारों का समागम हुआ, यह सौभाग्य की बात है। उन्होंने मंडल के सदस्यों से अपेक्षा किया कि आगामी गोष्ठी  तक वार्षिकांक 2021 के प्रकाशन हेतु रचनाएं अविलंब महामंत्री अथवा मेरे पास अवश्य उपलब्ध करा दें।

काव्य पाठ करते हुए इंजीनियर प्रभाकर मिश्र ने पढ़ा......


 रहम हो जिसके सीने में वह जालिम हो नहीं सकता।

 खुदा का सच्चा बंदा है तो नफरत बो नहीं सकता।


ओज के कवि यज्ञ कुमार पांडे यज्ञ ने पढ़ा.......

 मुझको भागीदार समझ चाहे बागीदार समझ।

 किंतु देश में लगी आग पर तेल तेल की धार समझ।


चर्चित रचनाकार अनूप त्रिपाठी  ने पढ़ा ......

राम कहें रहमान कहें इन सब को भगवान समझिए।

मंदिर कैसा मस्जिद कैसी ईश्वर का स्थान समझिए।


 समाजसेवी संजय शुक्ला ने पढ़ा.......

अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे।

 क्योंकि जितनी जरूरत थी उतना ही पहचाना मुझे।


बरिष्ठ साहित्यकार परशुराम उपाध्याय सुमन ने पढ़ा.....

अब जिन आया भाय करोना।

अर्थ व्यवस्था चौपट होइगै,

बचा अहै सिर धइके रोना।


छंदकार बाबूलाल सरल ने पढ़ा......

शिथिल हो रहे तार ये वीणा कहती है।

 पल जो शेष संवार ये वीणा  कहती है।


मंडल के संरक्षक यज्ञ नारायण सिंह अज्ञेय ने पढ़ा.......

जिंदगी हर मोड़ पर छली गई, हर सहारा एक धोखा रहा।

लोग दरिया में डुबकी लगाते रहे, मैं प्यासा किनारे तड़पता रहा।


अन्य रचनाकारों में डॉ केसरी नंदन शुक्ल केसरी, अशोक विमल, हरिवंश शुक्ला शौर्य, दीपेंद्र श्रीवास्तव तन्हा, अरविंद सत्यार्थी, रामजी आसमा, लल्ला सिंह, महिपाल सिंह, बाबा राज प्रतापगढ़ी, अब्दुल मजीद रहबर, अनिल मिश्र आदि प्रमुख रहे।

अंत में राष्ट्रगान के साथ गोष्ठी का समापन हुआ।








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