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देवताओं में विष्णु व्रतो में एकादशी है श्रेष्ठ - धर्माचार्य ओम प्रकाश पान्डेय अनिरुद्ध रामानुज दास Dainik mail 24

 


प्रतापगढ़ । 9 जनवरी दिन शनिवार को सफला एकादशी है ।धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि राजेंद्र पौष मास के कृष्णपक्ष में  एकादशी होती है उसका नाम सफला एकादशी है । महात्म्य का वर्णन करते हुए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं ।बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों से मुझे उतना संतोष नहीं होता जितना एकादशी व्रत के अनुष्ठान से होता है। इसलिए सर्वथा प्रयत्न करके एकादशी का व्रत करना चाहिए ।पौष मास के कृष्ण पक्ष में सफला नाम की एकादशी होती है। उस दिन पूर्व विधान से ही विधिपूर्वक भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिए। एकादशी कल्याण करने वाली है इसका व्रत अवश्य करना उचित है। जैसे नागों में शेषनाग ,पक्षियों में गरुड़, देवताओं में श्री विष्णु तथा मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है। उसी प्रकार संपूर्ण व्रतों में एकादशी तिथि श्रेष्ठ है ।सफला एकादशी को नाम मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करें। नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा, नींबू, जमीरा नींबू, अनार, सुंदर आंवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों से देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए। सफला एकादशी को विशेष रुप से दीप दान करने का विधान है। रात में वैष्णो पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए। जागरण करने वाले को जिस फल की प्राप्ति होती है। वह हजारों वर्ष तपस्या करने से भी नहीं मिलता। 

        सफला एकादशी की शुभ कारिणी कथा सुनो। चंपावती नाम से विख्यात पुरी है जो कभी राजा माहिष्मत की राजधानी थी।   राजा माहिष्मत के 5 पुत्र थे उनमें जो  जेष्ठ पुत्र था। वह सदा पाप कर्म में ही लगा रहता था, पर स्त्रीगामी और वेश्यागामी था। उसने पिता के धन को पाप कर्म में खर्च किया। वह सदा दुराचार तथा ब्राह्मणों का निंदक था। वैष्णो और देवताओं की भी हमेशा निंदा किया करता था। अपने पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा माहिष्मत राजकुमारों में उसका नाम लुम्भक रख दिया, फिर पिता और सभी भाइयों ने मिलकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया ।वहां से वह जाकर वन में रहने लगा, वहां जाकर उस पापी ने समूचे नगर का धन लूटना शुरू किया ।एक दिन वह चोरी करते समय नगर में पकड़ा गया, किंतु सिपाहियों से कहा मैं राजा माहिष्मत का पुत्र हूं इसलिए सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया ।वह पापी वन में लौट आया तथा वृक्षों के फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। बहुत वर्षों का वहां पर एक पुराना पीपल का वृक्ष था । वह उस वन में एक महान देवता माना जाता था। पापी लुंम्भक वहीं निवास करता था। एक दिन किसी संचित पुण्य के प्रभाव से पौष मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी का दिन आया और दशमी की रात वस्त्र हीन होने के कारण रात भर जाडे का कष्ट भोगा। उस समय उसे नींद नहीं आई, दूसरे दिन सूर्योदय होने पर उस पापी को होश नहीं आया सफला एकादशी के दिन भी बेहोश पड़ा रहा ।दोपहर होने पर उसे चेतना प्राप्त हुई इधर-उधर दृष्टि डालकर और लंगड़े की भांति पैरों से बार-बार लड़खड़ा ता हुआ वन के भीतर गया। लुम्भक  बहुत से फल लेकर ज्यों ही विश्राम स्थल पर लौटा तो उसी समय सूर्य देवता अस्त हो गए। तब उसने वृक्ष की जड़ में बहुत से फल निवेदन करते हुए कहा इन फलों से लक्ष्मी पति भगवान श्री  विष्णु संतुष्ट हो। वह रात भर नींद नहीं लिया ,अनायास ही उसने व्रत का पालन कर किया। आकाशवाणी हुई हे राजकुमार तुम सफला एकादशी के प्रसाद से राज्य और पुत्र को प्राप्त करोगे बहुत अच्छा कह कर उसने वह वरदान स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात दिव्य गुणों से सुशोभित होकर वहां अकटंक राज्य प्राप्त किया, और 15 वर्षों तक उसका संचालन करता रहा। भगवान श्री कृष्ण की कृपा से उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। जब वह बड़ा हुआ तो तुरंत ही राज्य की ममता को छोड़कर उसे पुत्र को सौंप दिया। भगवान श्री कृष्ण के धाम को चला गया। जहां जाकर मनुष्य कभी दुख में नहीं पड़ता। राजन इस प्रकार जो सफला एकादशी के उत्तम व्रत में लगे रहते हैं उन्हीं का जन्म सफल है। महाराज इसकी महिमा को पढ़ने सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है।








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