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धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी को भारत रत्न प्रदान किया जाए - धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास Dainik mail 24



प्रतापगढ़ । प्रतापगढ़ सर्वोदय सद्भावना संस्थान द्वारा विगत वर्षों की भांति पूज्य पाद धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी 39 वी पुण्यतिथि  रामानुज आश्रम में मनाई गई। वेद मंत्रों के बीच स्वामी जी के चित्र पर माल्यार्पण , दीप प्रज्वलन कर स्वामी जी द्वारा रचित रामायण मीमांसा का पूजन करने के पश्चात ओम प्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुज दास ने कहा कि धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी हमारे सनातन धर्म के प्राण थे। स्वामी श्री का जन्म श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वितीया संवत 1964 विक्रमी 11 अगस्त सन 1907 ईस्वी को ग्राम भटनी जिला प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में सनातन धर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण स्वर्गीय श्री राम निधि ओझा एवं परम धार्मिक स्वर्गीय श्रीमती शिवानी जी के आंगन में हुआ था। बचपन में आपका नाम हरिनारायण रखा गया ।स्वामी जी आठ नव वर्ष की आयु से ही सत्य की खोज हेतु घर से पलायन करते रहे । नौ वर्ष की आयु में सौभाग्यवती कुमारी महादेवी जी के साथ पाणिग्रहण संस्कार  संपन्न होने के पश्चात 19 वर्ष की अल्पायु में 2 वर्ष की लक्ष्मी स्वरूपा कन्या एवं पत्नी का परित्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से ब्रह्मचारी की दीक्षा ली। हरिनारायण से हरिहर चैतन्य बने। स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के शिष्य स्वामी जी की स्मरण शक्ति फोटोग्राफी के रूप में थी। एक बार जो चीज पढ़ लेते थे उन्हें बरसों बाद भी पूछने पर बता देते थे, आपने धर्म तर्क धुरंधर मदन मोहन मालवीय जी एवं स्वामी दयानंद सरस्वती जी को भी शास्त्रार्थ में पराजित किया था। 

         विद्वत परिषद के कुछ विद्वानों ने श्रीमद्भागवत पुराण के नवम एवं दशम स्कंद को अश्लील एवं क्षेपक कहकर निकालने का निर्णय कर लिया । उस समय करपात्री जी ने पूरे 2 माह पर्यंत श्रीमद्भागवत की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत कर सिद्ध कर दिया कि महारास तो भागवत की आत्मा है। 24 वर्ष की उम्र में परम तपस्वी 1008  स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दंड ग्रहण कर अभिनव शंकर के रूप में आप का प्राकट्य हुआ ।1948 में आपने अखिल भारतीय रामराज परिषद भारत की एक परंपरा वादी हिंदू पार्टी की स्थापना किया।  आप गोरक्षा आंदोलन में अनेकों बार जेल गए7 नवंबर 1966 को संसद भवन के सामने धरना प्रदर्शन करते हुए हिंदू पंचांग के अनुसार 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी के दिन लाठियां खाई जिसमें कई संत काल कवलित हुए।माघ शुक्ल चतुर्दशी संवत 2054 माह फरवरी 1982 को केदार घाट वाराणसी में आपके पंचप्राण महाप्राण में विलीन हो गए। आपके निर्देशानुसार आपके नश्वर पार्थिव शरीर का केदार घाट स्थित श्री गंगा महारानी की पावन गोद में जल समाधि दी गई आप द्वारा काशी में धर्म संघ की स्थापना की गई इस तरह आपका अधिकांश जीवन काशी में ही व्यतीत हुआ आप अद्वैत दर्शन के अनुयाई एवं शिक्षक थे। भगवान शालिग्राम की सेवा सदैव करते और तीर्थ पाद लेने के बाद ही कुछ प्रसाद लेते थे हाथ में जितना आता था उतना ही प्रसाद पाते थे इसलिए आपका नाम करपात्री पड़ा।आपने हिंदू धर्म की बहुत सेवा किया आप द्वारा अनेक अद्भुत ग्रंथ लिखे गए जैसे वेदार्थ  पारिजात रामायण मीमांसा विचार पियूष मार्क्सवाद और रामराज्य आदि है। दास ने प्रतापगढ़ में मारीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध रामानुज दास के आगमन के समय रानीगंज में आपकी रचित रामायण मीमांसा को भेंट किया जो आज मारीशस पर राष्ट्रपति राभवन में रखी हुई है। आप द्वारा धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो भारत अखंड हो गौ हत्या बंद हो का नारा दिया गया था ।इस अवसर पर धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महराज पुस्तक के रचयिता कविवर संगम लाल त्रिपाठी भंवर को अंगवस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से सुनील प्रभाकर सुरेश नारायण दुबे व्योम शेष नारायण दुबे राही गंगा प्रसाद पांडे भावुक उमाशंकर मिश्रा राम शिरोमण ओझा गिरीश दत्त मिश्रा राकेश सिंह अवध नारायण शुक्ला आचार्य कमलेश तिवारी आदि ने आपको अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए महामानव एवं प्रबल समाज सुधारक तथा मानवता की प्रतिमूर्ति बताया। भारत सरकार से भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान करने की मांग की गई। संचालन डॉ श्याम शंकर शुक्ल श्याम ने किया।








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